डा0 अम्बेडकर का राष्ट्रवाद व सामाजिक न्याय
डा0 भीमराव अम्बेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता एवं करोड़ों शोषित-पीड़ित भारतीयों के मसीहा ही नहीं थे। वल्कि वे एक उच्च कोटि के समाज सुधारक, श्रेष्ट विचारक, तत्वचिन्तक, अर्थशास्त्री, शिक्षा शास्त्री, पत्रकार, धर्म के ज्ञाता, कानून एवं नीति निर्माता और महान राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने समाज और राष्ट्र जीवन के हर पहलू पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। सामाजिक समानता और बंधुता के आधार पर उन्होंने नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व क्रमशः समुद्र जैसा विराट व हिमालय जैसा उत्तुंग था।
बबा साहब का व्यक्तित्व विविधयामी है। उन्होंने अभावों अपमानों और अड़चनों के पहाड़ों को चीर कर अपने सामर्थ और मेधावी शक्ति से सर्वोच्चता को प्राप्त किया। विपरीत धारा को पार कर शताब्दीयों से अन्याय व अधिकारों से वंचित वंधु-वांधवों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपने 65 वर्षीय जीवन में वह मुकाम हासिल करवाने की ठान ली जिनसे अस्पृश्य समाज वंचित था।
डा0 अम्बेडकर ने अनेक संघर्षों के बीच भी अपनी भारत भक्ति को हृदय से दूर नहीं किया। सामाजिक संघर्षों में भी उन्होंने अपना केन्द्र विन्दु एवं अन्तिम लक्ष्य राष्ट्रहित ही रखा। डा0 भीमराव अम्बेडकर का जीवन दर्शन और महान कार्य अनेक शताब्दीयों तक प्रेरणा देते रहेंगे। उनका मूल मंत्र या सूत्र था कि जबतक समाज के निचले तबके का मनुष्य आत्मगौरव या स्वाभिमान से खड़ा नहीं हो जाता तब तक यह देश भी खड़ा नहीं होगा।
उक्त विचार से देखें तो बाबा साहब के अविस्मरणीय योगदान को दो अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है पहला समाज और देश के लिए वे कैसे जिये? दूसरा देश की एकता, विकास व देश के प्राकृतिक संशाधनों और देश की सुरक्षा का विचार उन्होंने कैसे किया?
बाबा साहब ने अपने जीवन को यज्ञ के धधकते अग्निकुण्ड में तपाया था। समाज के निचले तबके के व्यक्ति को अगर ऊपर उठाना है तो उसे शिक्षा के अग्निकुण्ड में तपना होगा। इस विचार को देने से पहले बाबा साहब ने स्वयं अपने आपको शिक्षा के अग्निकुण्ड में तपाया था। इसे इस प्रकार से देखा जा सकता है कि बाबा साहब ने आर्थिक मुश्किलों के बावजूद विदेश में जाकर अनेक प्रकार की डिग्रियां प्राप्त कीं। आश्चर्य की बात यह है कि एक ऐसे गरीब परिवार में जन्म लेने वाले, तथा समाज में सबसे कम सम्मान प्राप्त करने वाले युवा बाबा साहब ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से एम0एस0सी0 की डिग्री प्राप्त की। व लन्दन में जाकर लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स से एम0ए0 एवं पी0एच0डी0 की तथा चार बड़ी डिग्रियां (एम0ए0, पी0एच0डी0, एम0एस0सी0 व डी0एस0सी0) अर्थशास्त्र विषय से प्राप्त कीं।
बाबा साहब ने अनेक शोधपत्र प्रस्तुत किए वे अपने शोधपत्र में लिखते हैं कि हमारा देश कैसे महान देश है मेरे देश का भूगोल कैसा है? वे लिखते हैं हमारे देश का उत्तरी भाग हिमालय से अच्छादित है सुरक्षित है। मेरे देश का दक्षिणी भाग समुद्र से घिरा है। हमारे देश में कितनी वनस्पतियां हैं? हमारे देश में कितने रिसोर्सेज हैं? ये सारी बातें कोई देशभक्त ही लिख सकता है और डा0 अम्बेडकर ने यह सब बातें न सिर्फ लिखा ही है वल्कि बड़ी दमदारी के साथ विभिन्न मंचों पर रखा भी है। डा0 अम्बेडकर मानते थे कि पहले भी देश और अंत में भी देश…………उनके ये शब्द आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए राष्ट्रसूत्र सरीखे हैं।
डा0 अम्बेडकर के बारे में कहा जाता है कि वे ’’शोषित-शुद्र कुलोत्पन्न, दरिद्रता में पले, अस्पृश्यता के अभिशाप के भुक्तभोगी, दलितों के कर्णधार, दीन-दुखियों के दर्दनांक दुखों से द्रवी भूत होने वाले पीड़ितों के आशा-प्रदीप एवं अधिवक्ता, भारत के महान मनीषी, गम्भीर ग्रंथकार अप्रतिहत समाज सुधारक, राजनीति तथा विधि विज्ञान के प्रकांड पंण्डित, महान विचारक एवं तत्व-चिंन्तक, घनघोर बुद्धिवादी, महान मानवतावादी, भारतीय संविधान के प्रधान शिल्पी,हिन्दू कोड बिल के प्ररेणता बौद्ध धर्म के पुनरावर्तक तथा विश्वबन्धुत्व के उपदेशक डा0 भीमराव अम्बेडकर के व्यक्तित्व में आक्रोश तथा आर्द्रता विद्रोह तथा विराम तथा क्रांन्ति तथा शान्ति सहयोग तथा असहयोग कठोरता तथा कोमलता, संकीर्णता तथा व्यापक्ता, जातीयता तथा राष्ट्रीयकता, देशप्रेम तथा विश्वंधुत्व का सुन्दर समीकरण तथा समन्यकारी चित्त दृष्टिगोचर होता है‘‘
बबा साहब लोकतंन्त्र में विश्वास करते थे। उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था, समता, समानता और बन्धुत्व पर टिका था। वे हमारे सामने सामाजिक न्याय पर आधारित संविधान मूलक लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की संकल्पना रखते हैं। डा0 अम्बेडकर की नज़र में राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। राष्ट्र का अर्थ होता है जन, भूमि और संस्कृति। जन, भूमि के आधार पर संस्कृति का विकास होता है और यह संस्कृति राष्ट्र को जोड़ने का काम करती है। बाबा साहब ने 1916 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी ’कास्ट इन इण्डिया शोध निबन्ध प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने लिखा है-‘‘भारत में सर्वव्यापी सांस्कृतिक एकता है यद्यपि समाज अनगिनत जातियों में बंटा है फिर भी वह एक संस्कृति से बंधा है’’। बाबा साहब का कहना है कि राष्ट्र केवल एक संस्कृति से खड़ा नहीं हो सकता। राष्ट्र को खड़ा होने के लिए सांस्कृतिक एकता के साथ साथ सामाजिक एकता का भी इतना ही महत्व है जब समाज विभिन्न जातियों में आपस में बंट जाता है तो उसके आदर्श अलग-अलग होते हैं और वे एक दूसरे से टकराते हैं। इसलिए बाबा साहब ने अपने पूरे जीवन काल में एकवर्णीय समाज की वकालत की। वर्तमान समय की समस्याओं यथा-जातिवाद, धर्मवाद व सम्प्रदायवाद आदि समस्याओं के समाधान को हम डा0 भीमराव अम्बेडकर के रास्ते पर चलकर ही प्राप्त कर सकते हैं।
लेखक
आलोक रंजन सिंह
