तौफीक कुरैशी रू उसूलों की राजनीति का आखरी कद

(पांचवीं पुण्यतिथि पर विशेष स्मरण)
मौत वो जिसको जमाना करे याद यूं तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए। राजनीति जब नफरत/ध्रुवीकरण और तात्कालिक लाभ की भाषा बोलने लगे, तब समाज अनायास ही उन लोगों को याद करता है जिन्होंने राजनीति को इंसानियत की जबान सिखाई थी। ऐसे ही समय में मरहूम नेता तौफीक कुरैशी (रहमतुल्लाह अलैह) की याद आना कोई संयोग नहीं बल्कि सामाजिक जरूरत है। वे राजनीति में शोर नहीं थे, वे राजनीति की आत्मा थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश खासकर सहारनपुर, देवबन्द और आसपास के इलाकों की राजनीति में तौफीक कुरैशी (रह.) एक अलग पहचान थे। वे सर्वधर्म समभाव की राजनीति करने वाले ऐसे नेता थे जिनकी स्वीकार्यता समाज के हर तबके में थी। राजनीति से अलग देखने पर भी वे एक अजीम इंसान नजर आते हैं ऐसा इंसान जो खुद में मोहब्बत का पैगाम था। यही वजह थी कि लोग उन्हें औपचारिक नाम से नहीं, बल्कि अपनत्व से ‘नेता जी’ कहते थे। विश्वविख्यात इस्लामिक नगरी देवबन्द की ऐतिहासिक धरती के मोहल्ला बैरून कोटला में जन्मे तौफीक कुरैशी (रह.) ने छात्र जीवन से ही नेतृत्व का अर्थ समझ लिया था। वे किसी पद के कारण नेता नहीं बने, बल्कि लोगों ने उन्हें नेता बनाया। मैं यह कहने में संकोच नहीं करता कि स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के बाद उत्तर प्रदेश में अगर किसी शखसियत के नाम के साथ ‘नेता’ अपने आप जुड़ा, तो वे तौफीक कुरैशी (रह.) ही थे। उनका जीवन दो नगरों में बंटा रहा देवबन्द और लखनऊ। लखनऊ में रहते हुए वे अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में ‘चाचा’ कहलाए। यह संबोधन भी सत्ता का नहीं, भरोसे का था। जमीयतुल कुरैश की उत्तर प्रदेश इकाई के वे उपाध्यक्ष रहे, लेकिन उनकी पहचान किसी संगठन तक सीमित नहीं रही। आखरी विदाई और सामाजिक स्वीकार्यता 10 मई 2021, उम्र 80 वर्ष। रमजान का पाक महीना और छब्बीसवां रोजा सत्ताइसवीं शब इस्लाम में रमजान की बेहद मुकद्दस रात। ऐसा लगता है जैसे ईश्वर ने भी उनकी विदाई के लिए पवित्र समय चुना। विश्वविख्यात इस्लामिक यूनिवर्सिटी दारुल उलूम देवबन्द के अहाता-ए-मौलसरी में नमाज-ए-जनाजा अदा की गई और फिर ईदगाह रोड स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उस दिन उमड़ी भीड़ ने यह साबित कर दिया कि तौफीक कुरैशी (रह) किसी एक मजहब या समाज के नेता नहीं थे। हर धर्म, हर वर्ग, हर विचारधारा के लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए थे। सच है किसी व्यक्ति की असली हैसियत उसके आखरी सफर में सामने आती है। धार्मिक आस्था और सामाजिक प्रतिबद्धता वे नमाज-रोजे के पाबंद थे, लेकिन उनकी धार्मिकता दिखावे की नहीं थी। वे मानते थे कि धर्म इंसान को बेहतर बनाता है, दूसरों से अलग नहीं करता। उनकी असली रुचि समाज सेवा और राजनीति में थी ऐसी राजनीति जो जमीन पर चलती है,गरीबों की भलाई के लिए होती न कि भाषणों में नहीं। चैधरी चरण सिंह से कांग्रेस तक चैधरी चरण सिंह के वे अत्यंत करीबी थे। बाद में लोकदल छोड़ने के बाद कांग्रेस में आए। देवबन्द की राजनीति के धुरी, तीस वर्षों तक विधायक रहे ठाकुर महावीर सिंह उनकी अहमियत भली-भांति समझते थे। 1983 में जैसे ही तौफीक कुरैशी (रह.) ने लोकदल से इस्तीफा देने की घोषणा की, तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के निर्देश पर ठाकुर महावीर सिंह स्वयं उनके आवास पहुँचे और कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह किया जिसे उन्होंने स्वीकार किया। इसके बाद अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वे कांग्रेस में सक्रिय रहे। सरकार की ओर से उन्हें जेल विजिटर, राष्ट्रीय एकीकरण परिषद का सदस्य नामित किया गया। वे उर्दू अकादमी के भी सदस्य रहे, कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव, खांन गुफरान जाहिदी कमेटी से जुड़े और लंबे समय तक जेल विजिटर रहे। इन सभी भूमिकाओं में उनका एक ही तरीका था लोगों की मदद। उनके आवास पर मोहम्मद अरशद खांन (रहमतुल्लाह अलैह) के जरिए फरियादियों की बात सुनी जाती और संबंधित अधिकारियों से फोन या पत्राचार के माध्यम से समाधान कराया जाता। मदद के बदले कभी कोई अवैध लाभ नहीं लिया गया। वीर बहादुर सिंह और नश्तर साहब वीर बहादुर सिंह उन्हें बेहद मानते थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1985दृ1988) रहते हुए और बाद में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री बनने पर भी उनके संबंध बने रहे। दिल्ली में मुलाकातें होती थीं। एक बार पेरिस यात्रा से पहले मिलने का संदेश आया, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हो सकी। वीर बहादुर सिंह ने कहा “लौटकर मिलेंगे, एक जरूरी बात करनी है। दुर्भाग्यवश वही उनकी अंतिम यात्रा सिद्ध हुई। 30 मई 1989 को पेरिस में उनका निधन हो गया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री अबदुर्रहमान खांन नश्तर (रहमतुल्लाह अलैह) से भी तौफीक कुरैशी (रह.) के गहरे संबंध थे। नश्तर साहब की इच्छा थी कि 1988 में संभावित नगर पालिका चुनाव में तौफीक कुरैशी (रह.) को कांग्रेस से चेयरमैन बनाया जाए, लेकिन उनके निधन के कारण यह सपना अधूरा रह गया। सत्ता नहीं, असर की राजनीति तौफीक कुरैशी (रह.) की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता थी पद की लालसा का पूर्ण अभाव। चैधरी चरण सिंह ने उन्हें विधान परिषद भेजने का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया और किसी और को भेजने का आग्रह किया। एक ऐतिहासिक प्रसंग इसका प्रमाण है। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी, यूपी में रामनरेश यादव मुख्यमंत्री थे। तौफीक कुरैशी (रह.) सीधे चैधरी चरण सिंह के पास पहुंचे और हरिजन समाज कल्याण मंत्री राम सिंह मांडेबास को गृह मंत्री बनाने की मांग रख दी। चैधरी चरण सिंह ने बिना देर किए मुख्यमंत्री को फोन किया और आदेश दे दिया। यही नहीं, नागल सुरक्षित सीट से राम सिंह मांडेबास को टिकट भी तौफीक कुरैशी (रह.) ने ही दिलवाया। गृह विभाग में नियुक्तियों के दौरान भी उनकी सिफारिशों पर नियुक्तियां हुईं, लेकिन किसी से एक पैसा भी नाजायज नहीं लिया गया। इस ईमानदारी से स्वयं गृह मंत्री राम सिंह मांडेबास भी हैरान रह गए। रशीद मसूद से मतभेद रशीद मसूद (रहमतुल्लाह अलैह) को चैधरी चरण सिंह के करीब लाने वाले भी तौफीक कुरैशी (रहमतुल्लाह अलैह) ही थे। यूपी लोकदल की कमान रशीद मसूद को सौंपे जाने पर जब एक यादव नेता ने विरोध किया, तो चैधरी चरण सिंह ने साफ कहा “तौफीक कुरैशी (रह.) ने पैरवी की है, अब कुछ नहीं हो सकता। लेकिन देवबन्द सीट के टिकट को लेकर मतभेद हुआ। तौफीक कुरैशी (रह.) भायला गांव के राजेन्द्र पाल सिंह एडवोकेट को टिकट दिलाना चाहते थे जबकि रशीद मसूद (रह.) किसी और के पक्ष में थे। टिकट न मिलने पर वे इतने आहत हुए कि उन्होंने चैधरी चरण सिंह का साथ ही छोड़ दिया। मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। उसूलों के आगे रिश्ते छोटे पड़ गए।
निजी जीवन और विरासत
उन्होंने अपने लिए या अपनी औलादों के लिए सत्ता का इस्तेमाल नहीं किया। उनके दो बेटे तौसीफ कुरैशी और तसलीम कुरैशी पत्रकार हैं। तीन बेटियां हैं। परिवार को इस बात का कोई मलाल नहीं कि उनके पिता ने कुछ जोड़कर नहीं छोड़ा। वे कहते थे “यह काम मेरा नहीं, अल्लाह का है। गलत तरीके मुझे मंजूर नहीं। उनका सिद्धांत था “नेकी कर, दरिया में डाल। आज उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि पर जब राजनीति मूल्यविहीन होती जा रही है, तौफीक कुरैशी (रह.) जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि राजनीति का असली उद्देश्य सत्ता नहीं, समाज है। ऐसे लोग मरते नहीं वे अपने कामों, अपने उसूलों और लोगों की यादों में अमर रहते हैं। सत्यमेव जयते।
